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सफलता किसी भी क्षेत्र में मिल सकती है बस उसको पाने तक हम ही कई बार हिम्मत हर जाते है। कई बार हम अंतिम पायदान पर पहुंचते पहुंचते भी वापसी कर लेते है।
सफलता पाने के दो मूल आयाम है — प्रथमतः खुद पर भरोसा और दूसरा अपने काम पर।
फिर बात आती है निरंतरता की सबसे जटिल कार्य यही है। हमारी निरंतरता खत्म हो जाती है जब हमे वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिलती जैसी हम अपेक्षा कर लेते हैं।
कई बार हम इतनी बड़ी आशा कर लेते है जिसका पूर्ण होना संभव ही नहीं होता और हम कार्य करना वही से छोड़ देते है।
अब ऐसी स्थिति में प्रशंसा ही सबसे बड़ा हथियार होती है, यह पक्की बात है कि जो सफल हैं या होते है उनके ऊपर विस्वास करने वालों की संख्या कम से कम एक तो होती ही है।
जब वही एक व्यक्ति प्रशंसा में यह कहता है कि लगे रहो, प्रयास करते रहो, अच्छा काम कर रहे हो तो कहीं हद तक निरंतरता बन जाती है।
निरंतरता के बाद नवाचार का होना भी आवश्यक है। कार्य में हमेशा नयापन हो यानि कुछ ऐसा जो अभी तक क्षेत्र में मौजूद न हो या पहर जो मौजूदा कार्य हो उसी बेहतर ढंग से किया जाये कि वो अपने आप में ही एक अलग पहचान बना ले।
जो भी कार्य आप चुनते हैं या उसको करते हैं उसमे यह भी ध्यान देना चाहिए कि क्या उससे समाज में कुछ नैतिक मूल्य प्राप्त हो रहे हैं। आपके कार्य में समाज सेवा एवं सामाजिक उत्थान भी होना चाहिए यदि आपके कार्यों में सेवा और मूल्य नहीं है तो हो सकता है की आप उस कार्य से जल्द ही शिखर तक पहुंच जाएँ परन्तु धरातल पर भी आने में समय नहीं लगेगा।
शुरुवात कब करें
यदि दिमाग में एक अच्छा विचार आ गया है तो उसपर तत्काल ही शुरुवात कर दें हो सकता है की वो बेहतर न हो परन्तु समय के साथ उसमे बदलाव करके उसे बेहतर बना सकते हैं लेकिन अगर इंतजार ही करते रहेंगे की एक बेहतर विचार आये तो ही शुरुवात करें तो शायद ही शुरुवात हो पाए।
देखिये गलतियां होना संभव है और वो इंसान ही क्या जिससे गलतियां न हो बस समझने वाली बात यह है कि आप कितनी जल्दी उस गलती को समझ पाते हैं और उसके बाद उसमे परिवर्तन करते हैं।
यह गलतियां होने का ही डर है जो आज हम कोई ठोस कदम नहीं उठा पाते यहाँ तक की कक्षा में सवाल नहीं नहीं पूछ पाते क्योंकि हमे लगता है यह सवाल सुनते ही सब हंसने लगेंगे और इसी कारण से कक्षा उन बेहतरीन सवालों से वंचित रह जाती है।

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