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समय के साथ शिक्षण प्रक्रिया में कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं,जैसे दाल को स्वादिष्ट करने के लिए तड़का लगाया जाता है कुछ उसी प्रकार शिक्षक अपने पढ़ाने के तरीकों में भी अलग-अलग प्रकार का तड़का लगा रहे हैं।
परन्तु अध्यापन कार्य में जो एक चीज छूट रही है हम उसपर विचार नहीं कर पा रहे ऐसा नहीं है की हम सभी विचार नहीं कर रहे कुछ अध्यापक ऐसे हैं जो पुरजोर प्रयास कर रहे है छात्रों की दिशा में परिवर्तन का।
व्यक्तिगत जो मुझे दिख रहा है कि हम छात्रों को खुद से सोचने का मौका कम दे रहे हैं शयद खुद पढ़ने का भी। जब हम देखते है की आज की स्तिथि में छात्र पहले स्कूल जाता है फिर स्कूल के अध्यापक छात्र के घर अथवा छात्र अध्यापक के संस्थान में जाता है फिर वहां भी कक्षाएं चलती हैं। छात्र और अभिभावक दोनों को लगता है कि पढाई बहुत ज्यादा हो रही,एक लम्बा समय शिक्षा ग्रहण करने में जा रहा।
बशर्ते वो ये नहीं समझ पाते की पढ़ना और पढ़ाना दोनों भिन्न कार्य है,यह कुछ इस पप्रकार है जैसे खाना बनाना और खाना खाना। जो सिर्फ खाना खाता है वो कितने भी साल खाना खाये वो खाना बनाना नहीं सीख पायेगा उसके लिए खुद से बनाने का अभ्यास आवश्यक है और उस अभ्यास के लिए समय का होना महत्त्पूर्ण है। इसी प्रकार सारा दिन किसी को पढ़ाते हुए देखकर या सुनकर आप अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकते। ज्ञान अर्जित करने के लिए आपको स्वयं से सबसे अधिक पढ़ना पढ़ेगा।
यदि तकनीक को इस्तेमाल कुछ नया सीखने और जानने में किया जाये तो काफी कुछ पाया जा सकता है परन्तु हम उसका इस्तेमाल विषय के सवालो को छापने के लिए करते है,किसी भी सवाल को लगाते हुए यदि हम फस जाते हैं तो हम उसपे खुद से सोचकर हल करने का समय नहीं लगते बल्कि उसका जवाब तुरंत ही गूगल करते है जिसकी वजह से हम अपने विवेक का इस्तेमाल करना ही भूल गए है,हमे हर सवाल का जवाब किसी और ही जानने की क्रिया अपना ली है।
शिक्षा एवं बुद्धि का तार्किक अस्तर शायद शहरों में कुछ हद तक सही है वो भी इसलिए क्योंकि वहां शैक्षिक किताबों के अलावा विभिन्न प्रकार व्यवसायिक अध्ययन व्यवस्था है साथ ही तकनीकी शिक्षा एवं खेलने की भी सुविधा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो बस हम सिर्फ एक कार्य बताया जाता है पढ़ना।
कुछ कमी हम-आप जैसे अध्यापकों में भी है क्योंकि हमे भी अन्य क्षेत्रों की उतनी जानकारी है नहीं तो हम बस विषय को लेकर भागते रहते हैं,अब यह भी एक बड़ी वजह है जिसकी वजह से छात्रों को बीएस एक सीमित ज्ञान मिल पाता है जो आगे चलकर उन्हें समूह में एक पिछड़ापन महसूस करवाता है।
“कक्षा की किताबों के बहार ही असली दुनिया है जो किताबों में लिखे आदर्शों से बिल्कुल इतर है,जिसका अनुभव किताबों की ही भाँती अतिआवश्यक है”
यहाँ अंतिम कड़ी में मैं महान दार्शनिक सोक्रेटस की विचारों को साझा करूंगा “मैं किसी को कुछ भी नहीं पढ़ा सकता,मैं बस उनको खुद से सोचने पर मजबूर कर सकता हूँ”

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